क्या एटम बम से ज्यादा खतरनाक बन चुका है AI?

Bharat Ek Soch: आजकल आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की चर्चा है, लेकिन इसके फायदे हैं या नुकसान? इसके क्या प्रभाव हो सकते हैं, आइए जानते हैं…

Bharat Ek Soch: 2023 का कैलेंडर पलटने में अब दो हफ्ते से भी कम का समय बचा है…नए साल में ग्लोब पर दिख रहे 50 से अधिक देशों में चुनाव होना है। इसमें दुनिया का सबसे बड़ा और पुराना लोकतंत्र यानी भारत भी शामिल है। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में भी लोग नई सरकार के चुनाव के लिए अपने वोट की ताकत का इस्तेमाल करेंगे।

अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव होना है…ब्रिटेन में भी लोग अपने वोट से अपना भाग्य विधाता चुनेंगे। आपके मन में सवाल उठ रहा है कि चुनाव तो तय समय के हिसाब से होते ही हैं…राजनीतिक दल अपने उम्मीदवार खड़े करते ही हैं। इसमें नया क्या है? 2024 में होने वाले चुनाव पिछले चुनावों से कितने अलग होंगे… प्रचार का तौर-तरीका कितना बदला दिखाई देगा?

क्या डीपफेक तकनीक भारत में चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है…क्या डीपफेक और सोशल मीडिया किसी की जीत-हार में बड़े किरदार की भूमिका में होंगे? क्या डीपफेक और सोशल मीडिया के जरिए वोटरों की माइक्रोटारगेटिंग होगी? क्या डीपफेक और सोशल मीडिया से फैलाई जाने वाली अफवाहों को रोकने के लिए कोई कानूनी कवच है? लोगों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से फायदा है या नुकसान ही नुकसान है? ऐसे सभी सवालों को समझने की कोशिश करेंगे- अपने खास कार्यक्रम डेमोक्रेसी में डीपफेक…नायक या खलनायक में…

इन सवालों के जवाब अपने आप से पूछिए

सबसे पहले शुरुआत एक सवाल से करते हैं, जरा हिसाब लगाइए कि सुबह आंख खुलने से लेकर रात में गहरी नींद में जाने तक आपका कितना समय स्मार्टफोन के स्क्रीन पर बीतता है? सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किस तरह के वीडियो, शॉट्स और रील्स को देखते हैं…स्मार्टफोन और सोशल मीडिया से कितनी जानकारी आपको और आपके परिवार के दूसरे सदस्यों को मिलती है?

इस सवालों के जवाब अपने आप से पूछिए…तब तक एक और आंकड़े से आपका परिचय कराना भी जरूरी है। भारत में कुल वोटरों की संख्या करीब 95 करोड़ के आसपास है। वहीं, देश में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वालों की तादाद 75 करोड़ के करीब है..जिसमें से 46 करोड़ लोग सोशल मीडिया के किसी-न-किसी प्लेटफॉर्म पर एक्टिव है। लोग जिस रफ्तार से डिजिटली जुड़े हैं.. उसी रफ्तार से राजनीतिक दलों ने भी खुद को लोगों से जुड़ने के लिए तकनीक के रास्ते को आजमाया है। चुनाव प्रचार में अब पहले की तरह पोस्टर कम दिखाई देते हैं।

चुनाव के दौरान हो सकता है तकनीक का इस्तेमाल 

राजनीतिक पार्टियां Whatsapp, Facebook, Youtube, Insta और X के जरिए भी वोटरों से जुड़ने की पूरी कोशिश कर रही हैं। डीपफेक तकनीक की वजह से नए तरह का खतरा पैदा हो गया है…इस तकनीक का इस्तेमाल चुनाव के दौरान किसी की छवि बनाने और किसी की बिगाड़ने में हो सकता है। ऐसे में सबसे पहले समझते हैं कि आखिर डीपफेक है क्या और समाज के लिए कितना बड़ा खतरा है?

प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में ग्लोबल पार्टनरशिप ऑन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शिखर सम्मेलन में कहा कि डीपफेक पूरी दुनिया के लिए एक चुनौती है। पीएम मोदी ने भले ही ये बात वैश्वीक सुरक्षा के संदर्भ में कही हो, लेकिन लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने में डीपफेक तकनीक की भूमिका और खतरे पर भी गंभीर मंथन जरूरी है। भारत के सामाजिक ताने बाने में लोग अपने विधायक, सांसद और मंत्रियों से बड़ी उम्मीद रखते हैं। नेताओं का एक उल्टा-सीधा बयान पूरा खेल पलटने के लिए काफी होता है।

वोटर तो गलत को भी सही मान सकते हैं

ऐसे में अगर चुनाव के दौरान डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल कर विरोधी पक्ष के उम्मीदवार का कुछ आपत्तिजनक वीडियो वोटरों में वायरल कर दिया जाता है या उल्टा-सीधा बयान के साथ चेहरा बदल दिया जाता है..तो क्या होगा? वोटर तो गलत को भी सही मान सकते हैं। झूठा और फर्जी वीडियो लोगों के बीच किस रफ्तार से वायरल होता है…ये किसी से छिपा नहीं है। कहा भी जाता है कि जब तक सच घर से बाहर निकलता है..झूठ आधी दुनिया का चक्कर लगा चुका होता है। ऐसे में डीपफेक के जरिए चुनाव में विरोधी पक्ष की छवि खराब करने की रेस जोर पकड़ सकती है।

पूरी दुनिया में डीपफेक के चर्चित मामलों की लिस्ट देखी जाए तो उसमें से एक होगा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक ऐसा बयान, जो उन्होंने कभी दिया ही नहीं था। एआई की मदद से बने फर्जी वीडियो में ट्रंप बेल्जियम से पेरिस जलवायु समझौते से नाम वापस लेने की बात कर रहे थे। इसी तरह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भी एक फर्जी वीडियो सामने आया-जिसमें वो कहते दिख रहे हैं कि रूस के तीन सरहदी राज्यों में यूक्रेनी सेना दाखिल हो चुकी है और पूरे देश में इमरजेंसी लगाई जा रही है… इसी तरह रतन टाटा से लेकर मार्क जुकरबर्ग तक का डीपफेक वीडियो वायरल हो चुका है।

विधानसभा चुनाव के दौरान डीपफेक की शिकायतें आईं

लोग भी एक नजर में फर्जी वीडियो को असली जैसा समझने लगते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मौजूद Content का सबसे ज्यादा इस्तेमाल युवा वर्ग करता है – उसमें भी खासतौर से 20 से 35 साल तक के बीच के युवा। भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है… ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी में सामने आया कि भारत में 54 फीसदी लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल सही जानकारी के लिए करते हैं। देश की बड़ी आबादी सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई जानकारी पर भरोसा करती है। लाइक और शेयर करने में खुद को सोशली एक्टिव महसूस करती है। हाल में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भी डीपफेक वीडियो की कुछ शिकायतें आईं… बॉलीवुड की कुछ चर्चित हीरोइनें भी डीपफेक का शिकार बन चुकी हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इससे बचने का रास्ता क्या है? क्या हमारे देश में डीपफेक के खतरे से बचाव के लिए कानूनी कवच मौजूद है ? दुनिया के दूसरे देश इस खतरे से निपटने के लिए क्या कर रहे हैं?

एआई में बेशुमार संभावनाएं भी

साइबर सिक्योरिटी पर काम करने वाले ज्यादातर एक्सपर्ट्स का मानना है कि डीपफेक का इस्तेमाल सबसे ज्यादा इस्तेमाल साइबर अपराधी करते हैं…जो लोगों का आपत्तिजनक वीडियो बनाते हैं और फिर फर्जी वीडियो का इस्तेमाल ब्लैकमेल यानी फिरौती के लिए करते हैं। साइबर अपराधियों के निशाने पर खासतौर से सेलिब्रिटीज, पॉलिटिशियन और बड़ी शख्सियतें होती हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया ने सिर्फ समस्याएं ही पैदा की हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सिर्फ नुकसान ही हैं। भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में एआई में बेशुमार संभावनाएं भी देखी जा रही है। AI की मदद से कृषि से लेकर स्वास्थ्य तक के क्षेत्र में बड़े बदलाव की स्क्रिप्ट तैयार करने का काम चल रहा है। देश के भीतर फसल बीमा कंपनियां पैदावार और सूखे की मॉनिटरिंग के लिए एआई का इस्तेमाल कर रही हैं। देश के कई राज्य कानून-व्यवस्था बेहतर बनाने में भी एआई की मदद ले रहे हैं।

इंसान तकनीक पर निर्भर

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से पूरी दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव की भविष्यवाणी की जा रही है और इसे महसूस भी किया जा रहा है। अगर आधुनिक विश्व इतिहास में बड़े बदलावों पर गौर किया जाए…तो भाप इंजन के आविष्कार को 1.0 कह सकते हैं। औद्योगिक क्रांति और मशीनीकरण को 2.0…कम्प्यूटरीकरण को 3.0…इंसान की जिंदगी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते दखल को 4.0…तकनीक इंसान की रोजमर्रा की जिंदगी में इतना अधिक दाखिल हो चुकी है…इंसान तकनीक पर इतना ज्यादा निर्भर हो चुका है।

जिससे भीड़ में भी वो तन्हा होता जा रहा है। हमारे देश के लोगों का रोजाना औसत 5 घंटे का समय स्मार्टफोन चुरा रहा है। ऐसे में साइबर वर्ल्ड के नटवरलाल अपने लिए नई संभावनाएं तलाश रहे हैं। इस कोशिश में चंद रुपयों के लिए उन्हें किसी की इमेज खराब करने से भी कोई गुरेज नहीं है। ऐसे में AI और डीपफेक तकनीक के दुरुपयोग का रोकने के लिए सख्त कायदा-कानून भी जरूरी है। लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया एआई , डीपफेक और सोशल मीडिया के दुरुपयोग से मुक्त रहे.. इसका भी एक चुस्त-दुरुस्त मैकेनिज्म होना चाहिए।

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